अनन्त

अनन्त नाग का प्रतिपादन शास्त्रों में है। "अनन्तश्चास्मि नागानां"। यह अनन्त तत्त्वतः क्या है? वेदार्थ का अशेष दिशा है। अनेक domain के साथ मंत्रार्थ का प्रकटन जिस तत्त्व से हो वही अनन्त है।

मन्त्र के तीन प्रकार के अर्थ हैं। भौतिक , दैविक ( यज्ञीय ) और आध्यात्मिक । इन तीन अर्थों के अंतर्गत अनेक आनुसांगिक अर्थों को भी एक साथ निर्देश करने वाला प्राण समेत जो वाक्-निष्ठ चैतन्य तत्त्व है वही अनन्त है।

विज्ञान का कोई भी सूत्र एक domain में होता है। व्यावहारिक शब्द कुछ स्तर तक भिन्न domain में सार्थक होते हैं। किन्तु वेद मंत्रों में एक साथ अनेक domain के अर्थ निहित हैं। उसका युगपत व्याख्यान सामर्थ्य से युक्त प्राण सहित वाणी से सन्नद्ध चैतन्य तत्त्व ही अनन्त है।

वाणी=सूचक
प्राण=पदार्थत्व ( वह्यान्तर-क्रिया -युक्त )
चैतन्य स्वयंप्रकाश और कार्यकारणरूप समस्त तत्वों का उद्भासक।

प्राण क्यों? क्यों कि वाणी शब्द रूप है। सम्बन्धित क्रिया सहित अर्थ रूप है। तथा चैतन्य ज्ञाता और अन्य समस्त प्रकाश्य तत्त्व का प्रकाशन करता हुआ स्वयं प्रकाश है। इस प्रकार से वेदार्थ की पूर्णता सम्पन्न होती है। यही अनन्त का दैवत्य है।

एक अथवा कुछ अधिक domain में अर्थ का निर्भास मानुषी बुद्धि का विषय है। वहाँ देवता का अनुग्रह होते हुये भी बौद्ध प्राधान्य होने से वह पौरूषेय और अल्पार्थ में ही संकुचित और falsifiable है। जैसे विज्ञान के तथ्य।