ईश्वरत्व और दृश्य-विषयता

ईश्वर जगत् के अभिन्न-निमित्तोपादान कारण होते हुये भी अदृश्य क्यों है? यह एक प्रश्न है। वस्तुतः कोई चीज नहीं दिखना उसके अनस्तित्व में वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। परमाणु जैसे अदृश्य पदार्थ भी विज्ञान में प्रामाणिक हैं। ईश्वर को देखना! या ईश्वर को दृष्टिगम्य बनाना तब सम्भव है सन्दर्भित विषय में जब दृष्टि की आवश्यक साधनता perfect हो। वस्तुतः एक कञ्चे को भी दृष्टि सम्पूर्ण रूप से नहीं देख सकती। किसी भी सन्निकृष्ट दृश्यपदार्थ को आंख जब देखती है तो सिर्फ वस्तु के अत्यन्त अल्प हिस्सा ही दृश्य होता है।आँख प्रकाश के केवल एक बहुत संकीर्ण बैंड (visible spectrum: 400-700 nm) को ही ग्रहण करती है। यह रूप, रंग, आकार, गति का एक छोटा अंश ही पकड़ती है। लेकिन सम्पूर्ण दृश्य में शामिल हैं। इन्फ्रारेड, अल्ट्रावायलेट, एक्स-रे, गामा किरणें बहुत सूक्ष्म या बहुत दूर की वस्तुएँ जैसे दृश्य ब्रह्माण्ड से परे कुछ भी, समय और गति के सूक्ष्म स्तर (जैसे क्वांटम स्तर की
अनिश्चितता) को नहीं ग्रहण कर पाती है । इसलिए आँख दृश्य का केवल एक छोटा अंश ही ग्रहण करती है—सम्पूर्ण अंश कभी नहीं। फिर वह दृश्य तथ्य लगभग 90% से अधिक ऑप्टिक नर्व में ही फिल्टर हो जाती है। मस्तिष्क केवल वह अंश लेता है जो उसके लिए महत्वपूर्ण लगता है (selective attention)। blind spot (ऑप्टिक डिस्क) में कोई दृष्टि नहीं होती, मस्तिष्क खुद उस जगह को भर देता है। मस्तिष्क पिछली स्मृति, अपेक्षाएँ, भावनाएँ, और संस्कार प्रभावित पूर्वाग्रहों के आधार पर दृश्य को पुनर्निर्मित (reconstruct) करता है। आँख जितना अंश ग्रहण करती है, उसका एक बड़ा हिस्सा मस्तिष्क तक पहुँचता ही नहीं। जो पहुँचता भी है, वह छँटा हुआ, पुनर्निर्मित, और व्यक्तिगत संस्करण होता है—तथ्यतः पूर्ण अंश नहीं। टेलिस्कोप और माइक्रोस्कोप से उपलब्ध तथ्य भी इसी प्रोसेस से गुजरते हुये परिणाम दे पाते हैं। और अनुमाम भी मस्तिष्क के अनुसार डेटा को इंटरप्रिट करता है। इसलिये एक ही डोमेन मैं वैज्ञानिक तथ्य भिन्न भिन्न होते हैं। जब सामान्य वस्तु में दृश्यता ही अकिञ्चित्कर है तो ईश्वर के साक्षात्कार में इसकी क्या औकात? हो सकता है कि जो दिखाई देता है या अनुमित होता है वह अस्तित्व में ही न हो यह वैज्ञानिक है। किन्तु जो प्रत्यक्ष नहीं होता या अनुमित नहीं होता वह अस्तित्व में नहीं हो यह बिज्ञान विरोधी है।

वेद अज्ञात ज्ञापक रूप से स्वतः प्रमाण हैं।

प्रत्यक्षेणानुमित्या वा
यस्तूपायो न विद्यते।
एनं विन्दन्ति वेदेन
तस्माद्वेदस्य वेदाता।।

धर्म और ब्रह्म प्रत्यक्ष और (अनुमान ) तर्क से अज्ञेय होने के कारण वेद प्रमाण के ज्ञेय हैं।