विज्ञान और वेद — दो भिन्न आयाम, एक ही सत्य के भिन्न पक्षों के प्रमापक हैं। विज्ञान की गति प्रत्यक्ष और अनुमान के बीच सीमित है। वेद समग्र अस्तित्व के प्रत्यक्षवेद्य और अनुमेय अंश पर आर्षप्रामाण्य का अतिरिक्त भार नहीं लादता। वह आर्षदृष्टि द्वारा अन्य अप्रत्यक्ष और अननुमेय धर्म एवं ब्रह्म का प्रामाणिक प्रतिपादन करता है। इसीलिए वेद जो पौरुषेय है परस्पर विपरीत ज्ञात models के conservation में कोई चेष्टा नहीं करता। यही कारण है कि वह स्वविषय-प्रतिपादन-स्वतन्त्र है। विज्ञान जब ज्ञात-परिणामों की कारणता को ज्ञात-मॉडल से परे जाते देखता है, तब वह अकिञ्चित्कर रूप से अव्याख्येय Dark Matter और Dark Energy का नाममात्र जप करता है। यह एक संयोग हो सकता है कि "पौराणिक ईश्वर कृष्ण, राम और जगन्नाथ आदि वर्णदृष्ट्या Dark हैं"। और उपनिषदीय ईश्वर या ब्रह्म अतीन्द्रिय, मनोवाणी-अगोचर आदि रूप में परिभाषित अर्थ में Dark ही हैं। स्वयम्प्रकाश रूप से प्रकाशपूर्ण होते हुए भी निर्विशेषभूमि में अद्वैत तत्त्व में अन्य reflector के अभाव से अन्तरिक्ष के प्रकाश की भाँति दुर्विज्ञेय 'Dark' हैं। यह Dark concept वेद और विज्ञान में भिन्न रूप से स्थापित है।
ज्ञान के academicकरण के कारण आधुनिक शिक्षित-मनुष्य एक विचित्र द्वन्द्व में जीवन यापन कर रहा है। एक ओर विज्ञान, जो दृश्य और मापयोग्य विश्व को व्याख्यायित करने का प्रयास कर रहा है। दूसरी ओर वेद और शास्त्र, जो अतिरिक्त अधिभूत, अधिदैव और अध्यात्म रूपी अदृश्य आयाम का ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। ये दोनों परस्पर विरोधी नहीं — एक सत्य की भिन्न सीमाओं के स्वतन्त्र प्रहरी हैं।
ग्रहण का उपवास यहाँ एक विशेष उदाहरण है। एकादशी आदि उपवास भी इस द्वैत सत्य के एक उज्ज्वल उदाहरण हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से उपवास autophagy प्रक्रिया को सक्रिय करता है। इसे शरीर की कोशिकाओं के पुनर्निर्माण रूपक आत्मशुद्धि कहा जा सकता है। Yoshinori Ohsumi ने २०१६ में इस आविष्कार के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। किन्तु वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व काललिङ्ग के आधार पर उपवास विधान दे दिया था। यह श्रौत और स्मार्त आप्तपद्धति के अनुसार विहित है — केवल व्यक्तिगत इच्छाधीन कदापि नहीं।
प्रश्न उठता है — यदि शास्त्र विधान का हेतु अज्ञात या dark है, तो वह विज्ञान-विरोधी कैसे हुआ? Dark Matter का हेतु अज्ञात है, तथापि विज्ञान उसे अस्वीकार न करके अन्वेषण कर रहा है।
यहाँ विज्ञान की सीमा और वेद की अज्ञात-ज्ञापकता को देखना होगा। वर्तमान विज्ञान भौतिक जगत के एक क्षुद्र अंश मात्र को जान पाने में सक्षम है। ब्रह्माण्ड का ९५ प्रतिशत dark matter और dark energy — अज्ञात है। विज्ञान इसे placeholder नाम देकर अन्वेषण जारी रखे हुए है। वेद उस अज्ञात आयाम में भिन्न प्रमाण-पद्धति है। श्रुति, अनुभूति और आप्तवचन द्वारा जो आर्षतात्त्विक पदार्थसमूह है, उसके लिए प्रत्यक्ष और अनुमान भी आवश्यकतानुसार खण्डनीय हैं। शङ्कराचार्य ने कहा है — "श्रुतिमत्-तर्कोनुसन्धीयताम्" — श्रुति के आधार पर तर्क का अनुसन्धान होना चाहिए। यह नीति अन्वेषण को अवरुद्ध न करके एक निश्चित आधार प्रदान करती है। अधिदैव, अधिभूत और Configuration के बीच दूरी होनी चाहिए।
चन्द्रग्रहण आदि का प्रभाव जिसमें energy fluctuation मापनीय नहीं होता, वह configuration परिवर्तनजन्य प्रभाव है। यज्ञ से अपूर्व उत्पन्न होता है, अधिदैव स्तर पर प्रभाव का मूल रहते हुए अधिभूत में परिणाम प्रकट होता है। यह मीमांसा दर्शन का अपूर्व तत्त्व है — यज्ञ और फल के बीच अदृश्य संयोग। यह आयाम वैज्ञानिक मापन द्वारा वेद्य ही नहीं है। क्योंकि यह विज्ञान के ज्ञात और अनुमेय आयाम को अतिक्रमित करता है।
मूर्ख हेतुवादियों की भ्रान्ति को भी जानना आवश्यक है। प्रथमतः ओड़िया हेतुवादियों में प्रमुख यथा "प्रताप रथ" और "देवेन्द्र सुतार" का किसी वैज्ञानिक पङ्क्ति में नाम तक नहीं है। ये केवल प्रचारधर्मी TV programs की 'Fixed result debate' में "season Birds" की भाँति दिखाई देते हैं।
ये हेतुवाद के नाम पर एकादशी उपवास आदि शास्त्रीय विधि का विरोध कर रहे हैं। यह ज्ञात मॉडल के भीतर की असामग्रिक और सीमित दृष्टि का फल है। यदि ब्रह्माण्ड का अधिकांश भाग अज्ञात है, तो सम्पूर्ण ज्ञात-मॉडल के अनुसार भी अज्ञात आयाम के विधान को खण्डित करना अवैज्ञानिक है। यथार्थ सत्य सर्वदा स्वीकृत मॉडल को अतिक्रमित करके आगे बढ़ता है — Planck का quantum सिद्धान्त इसका प्रमाण है।
विज्ञान और वेद दोनों दर्शन के अन्तर्गत हैं। दोनों अज्ञात आयाम को स्वीकार करते हैं — एक dark शब्द द्वारा, दूसरा अधिदैव और अध्यात्म आदि आयाम द्वारा। उपासना का उपवास इस द्विविध सत्य का सङ्गम स्थल है — जहाँ शरीर, मन और आत्मा एक आयाम में शुद्ध होते हैं। इसका विरोध अज्ञानता ही है। यह कोई अन्वेषणा तो कदापि नहीं है।