मैंने आध्यात्मिक अनुभव की एक भूमि में पितृलोक का दर्शन किया। पितृलोक की यह भूमि 'चन्द्रलोक' और इसकी गति को 'चान्द्रायण मार्ग' क्यों कहा जाता है वह तब समझमें आया। इस लोक की आकृति गोलाकार है। इसकी गोलाकारता ही पुनरावर्त्तन का द्योतक है। वृत्त का हर अन्तिम विन्दु उसका आरम्भ विन्दु भी होता है। जन्म,कर्म, मृत्यु और पुनर्जन्म Cyclic Process है। कर्मकाण्ड और ब्रह्माण्डीय विज्ञान में 'मण्डल' शब्द का प्राधान्य है । यह मण्डलाकार पितृलोक बाहरी तरफ से एक स्थिर उज्ज्वल नील-आलोक-वेष्टनी से घिरा है। वह अन्दर से ठीक कलङ्क युक्त चन्द्रमा की तरह है। किन्तु इसकी उज्वलता क्षीण है। यहां अनुज्वल काले और अनुज्वल हल्के हरिद्राभ रङ्ग के छीटे ही व्याप्त हैं। यह सब बहुत साङ्केतिक है। यहां पर अपने पितरों का व्यक्तिगत साक्षात्कार नहीं होता। तो अपने पितरों के आकार, प्रकार और स्वभाव का कोई special pattern इस पितृलोक ज्ञान में नहीं बनता। एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अतिरिक्त अन्य सभी श्राद्ध अमन्त्रक होते हैं। केबल नाम मात्र से कव्य प्रदान किये जाते हैं। पितरों के कव्य सीधा पितृदेवताओं प्राप्त होकर उनसे यथा-भाग आवण्टित हो जाता है। प्रेत लोक से यह लोक भिन्न है। क्यों कि प्रेतों का व्यक्तिगत साक्षत्कार होता है। इसके बाहर की तरफ जो नीला उज्ज्वज आलोक का घेरा है वह इस लोक के अर्यमा, अग्निष्वात्त आदि पितृदेवताओं की दिव्यता और कर्मव्यवस्था की निष्पक्षता की ही दैवत्य है। यह उज्ज्वलता इस लोक का अधिस्ठातृ-देवत्व मात्र है। आत्मज्ञान का औजल्य नहीं है। यहाँ आत्मा का असङ्गत्त्व आदि याथात्म तिरोहित रहता है। यह विवेक-कुण्ठित भोग भूमि है।अन्दर जो हल्का पीतवर्ण के छीटे हैं वे शुभकर्म के परिणाम के सङ्केत हैं। और जो अनुज्वल काले रङ्ग के छीटे हैं वे अशुभ कर्मों के परिणाम के सङ्केत हैं। वहाँ कोई चलन, कम्पन, क्षोभण, सङ्क्रमण, अतिक्रमण या गति नहीं दिखती। इस प्रकार से मर्त्यभूमि की अस्थिरता का एक कालिक अवसान रूप शान्ति भी है। और इससे यह भी प्रतीत होता है की कर्म फल में कोई व्यभिचार नहीं हैं। हर एक कर्म का परिणाम स्वतन्त्र रूप से बाध्यता से भोक्तव्य है।
यह मानसिक कल्पना प्रवाह की कोई अन्तर्दशा नहीं थी। इस अनुभव में द्रष्टा के अहम् भूमि का कोई खेल नहीं था। यह अपूर्वानुभूत साक्षीविषय था । समय की बात कहें तो यह एक क्षण मात्र का अनुभव था किन्तु घड़ी पर साढ़े चार घंटे बीत चुके थे।