ऋग्वेद का रचना काल 1500–1200 BCE मानना एक प्रज्ञापराध है। यह भी एक वैचारिक पाप है। वेद की मनुष्य-सर्ग के प्रारम्भ में उत्पत्ति बतायी गयी है।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा
पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष
वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।
यहां पर "यज्ञाः" का "वेदाः" अर्थ खुद शङ्कराचार्य ने किया है। और कल्पान्त गणित अनर्थक नहीं हैं । वे केवल mathematical abstraction नहीं है। क्यों कि मन्त्र क्रियार्थक नहीं हों तो अनर्थक होते हैं। अनर्थक शब्दों से बने वाक्य मन्त्र नहीं होते।
वेद विद्या की मौखिक परम्परा का कोई पुरातात्त्विक साक्ष्य नहीं मिलता तो लब्ध पुरातात्विक साक्ष्य के आधार पर वेदविद्या का काल निश्चित कर देना एक षडयन्त्र है। विशेष कर के वैदिक इतिहास के साथ अन्याय हुआ। क्यों कि इतिहास के समयक्रम को इशाई कैलेन्डर में फिट करने का शासकीय दबाब था। यूरोप को अधिक प्राचीन सभ्यता सिद्ध करने का गलत उद्देश्य निहित था।
कोई कहे कि युगाब्धि गणित पुराणों, मनुस्मृति और महाभारत में विकसित हुआ है— यानी वैदिक काल के बाद । किन्तु स्मृति श्रुति के अर्थ को ही लोक वृत्ति में प्रतिपादित करते हैं। कोई भी स्मृति मूल सन्दर्भ को वेद विरुद्ध नहीं बना सकते। तो यह समय-सन्दर्भ भी वैदिक ही है।
और भी ऐतिहासिक जो भी साक्ष्य हैं उनका उपस्थित काल बताया जा सकता है। उपस्थिति से पहले कब से अनुपस्थित रहे यह नहीं बताया जा सकता। तो साक्ष्य के पूर्वकाल का इतिहास साक्ष्य से ज्ञात नहीं होता। अतः साक्ष्य-विदित इतिहास को सर्वप्रचीनता का ज्ञापक कहना प्रज्ञापराध है।
ऋग्वेद की भाषा का अवेस्ता से साम्य — यह काल-सापेक्ष तथ्य नहीं है। यह वैदिक भाषा के अनुकरण से अवेस्ता भाषा के विकाश की मूल प्रकृति को दर्शाता है। क्यों कि भारत में ऋषिकुल और विश्वविद्यालय की परम्परा सर्वप्राचीन हैं। यहाँ पर पढ़े लोगों ने अवेस्ता के लोक भाषा में संस्कृत को जोड़ा होगा। पारम्परिक भाषाविज्ञान ने संस्कृत-अवेस्ता साम्य से Proto-Indo-Iranian नामक एक काल्पनिक "जननी भाषा" की कल्पना की। किन्तु इसमें मूल पूर्वाग्रह यह है —
यह मान लिया गया कि साम्य = समान आयु = समान उद्गम जबकि वास्तविकता यह हो सकती है-
साम्य = अनुकरण = एक भाषा दूसरी से व्युत्पन्न। भाषावैज्ञानिकों ने Proto-Indo-Iranian की कल्पना इसलिए की क्योंकि —
संस्कृत को "इतनी प्राचीन" मानना उनके Eurocentric कालक्रम को तोड़ता था। जबकि Occam's Razor के सिद्धान्त से भी यह समर्थित है कि एक काल्पनिक "Proto भाषा" मानने की अपेक्षा यह मानना अधिक सरल और तर्कसङ्गत है कि अवेस्ता संस्कृत-प्रभावित भाषा है। Max Müller स्वयं अपने पत्रों में लिखते हैं कि वैदिक साहित्य को "undermine" करना उनका उद्देश्य था। यह documented है।