मुझे श्रीमद्भगवद्गीता की एक पुस्तक जरूरत थी जो कि कैलास आश्रम से छपती थी। उस में शाङ्करभाष्य, आनन्द गिरि की टीका और कैलास आश्रम के पूर्वाचार्यों की टिप्पणी सहित कैलास आश्रम के दशम पीठाधीश्वर स्वामी विद्यानन्द गिरि जी के द्वारा की गयी हिन्दी व्याख्या भी थी। इसका सम्पादन उनके भक्त स्वर्णलाल तुली जी ने किया था। उसी आश्रम के वर्त्तमान के दुराग्रही मण्डलेश्वर दिव्यानन्द सरस्वती जो कि एकादश पीठाधीश्वर होकर फिर त्रयोदश पीठाधीश्वर बना है, उसने उस पुस्तक के साथ कुछ अवैध छेड़छाड़ कर के उसे पुनः मुद्रित किया है। यहाँ पर इस सम्बन्ध में उसके पाप का पर्दाफाश करते हैं।
इस पुस्तक की भूमिका उमेशानन्द शास्त्री जी ने लिखी थी। उसपर वि. स. २०५४ / 9 जुलाई 1997 का तारीख डाला गया है। इस पुस्तक की भूमिका में, पुस्तक की अड़तालीस पृष्ठ मेँ ग्रन्थ के लेखक के रूप में स्वामी विद्यानन्द गिरि का नाम भूमिकाकार ने लिखा है। इस पुस्तक पर स्वामी महेशानन्द गिरि जी की शुभाशंसा भी है। यहाँ पर भी पुस्तक के लेखक के रूप में स्वामी विद्यानन्द गिरि जी का ही नाम है। स्वामी विद्यानन्द गिरि ने ही कैलास आश्रम के पूर्वाचार्यों की टिप्पणियों को संगृहीत किया था और स्वयं हिन्दी भाषा में भाष्य का अनुवाद भी किया था। कुन्तु इस परमपापी दिव्यानन्द सरस्वती जो हिन्दी भाषा भी ठीक से नहीं जानता है, उस पुस्तक के पीछे अपनी फोटो चिपका दी है। और स्वामी विद्यानन्द गिरि जी की फ़ोटो हटा दी है। कवर पेज में कहीं भी विद्यानन्द गिरि जी का नाम तक नहीं रखा है।
यह व्यक्ति क्या एक और कालनेमि है? जो अपने पूर्वाचार्यों का अनादर करे वह एक गुरु होना तो दूर की बात है वह वैदिक ही नहीं हो सकता। दूसरों की कृति पर अपनी फ़ोटो चिपका कर धन्यवाद की आकांक्षा करने वाले पाखंडी शठ क्या सन्न्यास का भी अधिकारी है? इस Idiot को ब्रह्मज्ञानी और गुरु मानने वालों की मूर्खता किस स्तर की है? वह भी विचारणीय है।
यह दुष्ट कैलास आश्रम के एकादश पीठाधीश्वर के रूप में पदभार लेते ही वहाँ के ब्राह्मणों से विद्वेष करना प्रारम्भ कर दिया था। और वहाँ से कर्मठ ब्राह्मणों को अन्ततः खदेड़ ही दिया। और वहाँ की समृद्ध गौशाला को समाप्त कर दिया । एक गौ ब्राह्मण का द्रोही नास्तिक कैसे वेदान्त का अध्यापक हो सकता है? इसकी यह गुरुता कालनेमि जैसी है । सुतरां अत्यन्त हेय है।