चन्द्रग्रहण का ज्योतिष:
भत्रिपादान्तरे राहोः
केतोर्वा संस्थितो रविः।
चतुष्पादान्तरे चन्द्र-
स्तदा सम्भाव्यते ग्रहः।।
जिस नक्षत्र में राहु या केतु स्थित होते हैं, उस नक्षत्र के तीन पादों के भीतर यदि सूर्य हो तो सूर्यग्रहण होता है। इसी प्रकार राहुयुक्त या केतुयुक्त नक्षत्र के चार पादों के भीतर यदि चन्द्र हो तो चन्द्रग्रहण होता है।
मूर्ख हेतुवादी लोग इस चन्द्रग्रहण के धार्मिक कृत्यों को अवैज्ञानिक कहकर हिन्दुओं को ईसाई बनाने के लिए या कम्युनिस्ट बनाने के लिए विज्ञान के नाम पर उत्पात करते देखे जाते हैं। चन्द्रग्रहण एक खगोलीय घटना है। आधुनिक विज्ञान के खगोल के जन्म से बहुत पहले वेदाङ्ग ज्योतिष स्थापित हो चुका था। और उसमें चंद्रग्रहण व सूर्यग्रहण का गणित विश्व की समस्त प्राचीन सभ्यताओं के खगोलीय गणित से अधिक अभ्रान्त और अधिक प्राचीन है। चूँकि इसके किसी सीधे भौतिक प्रभाव के विषय में धर्मशास्त्र में कुछ नहीं कहा गया है, इसलिए इसके धार्मिक कृत्य विज्ञान द्वारा खण्डनीय नहीं हैं।
विज्ञान की दृष्टि से इतना कहा जा सकता है कि चूँकि इसके प्रभाव में भौतिक ऊर्जा का कोई मापनीय विचलन दिखाई नहीं देता, इसलिए इसके लिए उपवास आदि किसी निषेधात्मक कार्य की पृथक उपयोगिता नहीं है। आधुनिक विज्ञान (NASA) कहता है — कोई सीधी भौतिक मापनीय हानि नहीं है, केवल पशु-पक्षी सामान्यतः प्रभावित होते हैं। अतः उपवास, दान, स्नान, जप को विज्ञान द्वारा खण्डित नहीं किया जा सकता। ये मन की शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और आधिदैविक क्रम की उन्नति के लिए उद्दिष्ट हैं।
तथापि हेतुवादियों के कम्युनिस्ट एजेण्डे के दमन के लिए मैं पहले उचित वैज्ञानिक पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित करूँगा। समान गतिक वायु यदि क्रमशः विभिन्न दिशाओं से बहे तो वहाँ गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) समान रहती है, परन्तु भिन्न-भिन्न दिशाओं से बहने वाली वायु भिन्न-भिन्न अनुभव प्रदान करती है। यह मनुष्य और पशु-पक्षियों के सन्दर्भ में समान रूप से लागू होता है। परिवर्तन के लिए नए मापनीय ऊर्जा-क्षोभ की आवश्यकता नहीं होती। केवल विन्यास-भेद (Configuration Difference) ही पर्याप्त है। चन्द्रग्रहण काल में घटित प्रकाश का विन्यास-भेद ही अधिदैव में भिन्न परिणाम देता है।