हम प्रायः मानते हैं कि एक बार प्राप्त ज्ञान स्थायी होता है। किंतु क्या हम ज्ञान को सुरक्षित रख रहे हैं — या केवल उस ज्ञान के मॉडल को?
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मॉडल संरक्षण का खतरा
जब कोई विचार, सिद्धांत या परंपरा इतनी दृढ़ हो जाए कि उस पर प्रश्न उठाना वर्जित लगे — तब ज्ञान की खोज रुक जाती है और मॉडल की रक्षा आरंभ हो जाती है।
यह खतरा केवल धर्म या परंपरा में नहीं —
विज्ञान, दर्शन और अकादमिक जगत — सभी में विद्यमान है।
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तो क्या समस्त मॉडल मिलकर सम्पूर्ण सत्य दे सकते हैं?
तीन महान विचारकों ने तीन अलग क्षेत्रों में यही प्रश्न उठाया —
Gödel — गणित में
किसी भी तार्किक तंत्र में कुछ सत्य ऐसे होते हैं जो उस तंत्र के भीतर से न सिद्ध हो सकें, न खंडित। अर्थात् — हर तंत्र अपनी सीमा के बाहर एक सत्य को देख सकता है, किंतु पकड़ नहीं सकता।
Wittgenstein — भाषा में
सत्य को भाषा में कहते ही वह उस भाषा के नियमों में बंध जाता है। जो वास्तव में कहने योग्य है — वह कहा नहीं जा सकता। जिसके बारे में बोला नहीं जा सकता — उस पर मौन ही उचित है।
Heisenberg — भौतिकी में
किसी कण की स्थिति और गति — दोनों को एक साथ पूर्ण यथार्थता से नहीं जाना जा सकता। और यह केवल माप की सीमा नहीं — यह वास्तविकता की प्रकृति है। देखने की क्रिया देखे जाने वाले को बदल देती है।
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तीनों में एक ही सूत्र —
जो जानने का साधन है — वही जानने की सीमा भी है।
तीनों बाहर से उस सीमा तक पहुँचे।
किंतु वेद ने यह सत्य बिना किसी क्षेत्र की परिधि के — केवल दो शब्दों में पहले ही कह दिया था।
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नेति नेति — यथार्थता का द्वार
"नेति नेति" का अर्थ केवल नकार नहीं है।
इसका अर्थ है —
जो भी तुमने सत्य का मॉडल बनाया — वह सत्य नहीं।
जो भी भाषा में आया — वह पूर्ण नहीं।
जो भी ज्ञेय बना — वह ज्ञाता से अलग हो गया।
"नेति नेति" मॉडल का अंत नहीं — यथार्थता का द्वार है।
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श्रुति और आप्तत्व
श्रुति कोई fixed ग्रंथ नहीं — एक गुण है।
एक ही श्रुति से अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत — परस्पर विरोधी दर्शन उभरे। यह किसी बंद मॉडल में संभव नहीं होता।
श्रुति का आधार है — आप्तत्व।
अर्थात् — निःस्वार्थ, निर्मल, यथार्थ-दर्शन की क्षमता।
जहाँ द्रष्टा निर्मल है — वहाँ यथार्थ दर्शन है।
जहाँ यथार्थ दर्शन है — वहाँ श्रुति संभव है।
काल, भाषा या परंपरा की सीमा नहीं।
नेति नेति
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नक्शा, भूमि नहीं है
मॉडल, सत्य नहीं है
ज्ञाता जब ज्ञेय से अभिन्न हो — वहाँ यथार्थता है