"अनन्त (∞) कोई "नंबर" नहीं है" यह अनन्त की निश्चायक परिभाषा नहीं है। extended/projective line में ∞ को “बिंदु” कह भी दें, तो वह topological convenience है, ontological सत्य नहीं । मूर्खों को सद्बुद्धि आये तो वे बोल सकते हैं कि अनन्त के सीमाकरण के लिये कोई भी संख्या अपर्याप्त है। कोई भी संख्या होगी उस की आद्य सीमा, प्रान्त सीमा और मध्य विन्दु होगा। वह अनन्त (∞) का आकलन कैसे करेगा? lim (x→∞) 1/x = 0;
(जितना x बड़ा होता जाता है, 1/x छोटा होता जाता है → 0 के करीब पहुँचता है)
lim (x→∞) x² = ∞
(x जितना बड़ा, x² उतना ही तेज़ी से अनंत की ओर)
→ यहाँ अनंत का "आकलन" व्यवहार देखकर होता है, न कि उसका कोई निश्चित मूल्य देकर। (extended real numbers में)
कुछ नियम हैं जो काम करते हैं:
∞ + कोई भी finite संख्या = ∞
∞ - finite = ∞
finite / ∞ = 0
∞ × finite (positive) = ∞
लेकिन कुछ नियम टूट जाते हैं:
∞ - ∞ → अनिश्चित (indeterminate)
∞ / ∞ → अनिश्चित
→ इसलिए अनंत को "मध्य बिंदु" या "सीमा" वाली संख्या की तरह नहीं देखा जा सकता।सामान्य संख्या रेखा (real line ℝ) दोनों तरफ अनंत तक जाती है, लेकिन अनंत बिंदु पर नहीं पहुँचती।
अनंत रेखा का कोई बिंदु नहीं है। यह सिर्फ दिशा या व्यवहार बताता है।
अगर हम projective line या extended real line लें, तो +∞ और -∞ को दो अलग "बिंदु" मान सकते हैं, लेकिन फिर भी कोई मध्य बिंदु नहीं बनता (क्योंकि 0 अब भी केंद्र है, लेकिन ∞ से दूरी मापना असंभव है)। कोई प्रारम्भ/अन्त नहीं होता है। मान लो हम किसी "अनंत लंबाई" वाली रेखा की बात करें, अगर दोनों तरफ अनंत है → कोई भी बिंदु चुनो (जैसे 0), वह "मध्य" नहीं कहला सकता, क्योंकि बाएँ भी अनंत दूरी, दाएँ भी अनंत दूरी। हर बिंदु समान रूप से केंद्र और समान रूप से किनारे पर है। इसलिए मध्य बिंदु जैसी कोई खास स्थिति अस्तित्व में नहीं आती। यह ठीक वैसे ही है जैसे अनंत सेट में "सबसे बड़ा" या "सबसे छोटा" सदस्य नहीं होता। इसका सरल निष्कर्ष माने तो सीमित संख्या → आद्य, अंत, मध्य — सब निश्चित हो सकता है। अनंत → न आद्य है, न अंत है, न मध्य है। इसका आकलन संख्या देकर नहीं, बल्कि व्यवहार, सीमा, या प्रक्रिया देखकर किया जाता है। अनंत "कितना बड़ा है" यह पूछना बेमानी है — यह बड़ा होता जाता है बिना कभी "बडे परिणाम या परिमाण" पर रुके। अगर हम अनंत को मजबूर करके "संख्या" मान लें, तो गणित में विरोधाभास आ जाते हैं (जैसे ∞ - ∞ = ?), इसलिए गणितकार अनंत को एक प्रतीक या सीमा के रूप में इस्तेमाल करते हैं, न कि एक सामान्य अंक के रूप में। एतावता अनन्त की गणितीय भावना का उपन्यास हो जाता है।
ब्रह्म जो अनन्त है उसका ज्ञान कैसे किसी गणितीय या तार्किक अथवा प्रमेयरूपक मडेल के अन्तर्गत हो सकता है? तब यह कहना पड़ेगा कि अखण्डब्रह्माकाराकारिताचित्तवृत्तिरूप ब्रह्मज्ञान model less model है। यह पूर्णतः model-less ही है। क्यों कि वृत्ति में केबल ब्रह्म ही होता है। ज्ञेयता नहीं। क्यों कि ब्रह्म स्वयंप्रकाश है। खुद Subject है। और इस वृत्ति में केवल चित्त-रहित वृत्ति ही होती है। क्यों कि कारणशरीर = अज्ञान का कार्य चित्त वहाँ नहीं होता। ब्रह्मज्ञान में वृत्तिव्याप्ति होती है। फल व्याप्ति नहीं। अर्थात् इदं इत्थं आकारप्रकारता उंसमें नहीं होती। इदं इत्थं आकारप्रकारता होती तो यह model होता। इसे model से परे मॉडल ही कहा जा सकता है।
यह योग समाधि जैसा नहीं है। A = प्रमाणादि वृत्ति। B = निरोध। जब चित्त (c) B पर होता है तो A का निरोध होती है। किंतु B A से सीमांकित है। तो अन्य स्थिति में c B से पृथक हो जाता है। वहाँ B की स्मृति एक विकल्प भर हो जाती है। फिर से A का प्रभाव उतना ही होता है। तो ब्रह्मज्ञान में खुद धारक c (चित्त) ही नष्ट हो जाता है।
मापन का हर मॉडल ही बन्ध है। सारे बन्धन को नष्ट करने के लिये वेदान्त के पास "नेति नेति" का अक्षय तूणीर है। विचार का कोई भी मॉडल बनता है तो तुरन्त वह उसे तोड़ता है। किन्तु योग के पास A या B के मॉडल ही विकल्प। सारी वृत्तियां ही मॉडल हैं यह तो ज्ञात है। किंतु समाधि भी आपेक्षिक मॉडल ही है। क्यों कि पूरी बात "चित्तवृत्तिनिरोधः" है न केवल चित्तनिरोध, न केवल वृत्तिनिरोध। और न निरोध मात्र। चित्त से विशेषित वृत्ति के निरोध मेँ चित्त समाहित बच जाता है। तो यह समाधान अज्ञान का सम्पूर्ण नाशक नहीं है। प्रेक्षक मात्र है।
मॉडल ही बंध है। यह शिवसूक्त में 'कलाशरीर" के रूपमें बताया है। "योनिवर्गः कलाशरीरम्' यहाँ पर "ज्ञानं बन्धः" से बन्धः पद का अनुवर्त्तन हो जाता है।