मठों का अभोज्य अन्न

मठेष्वभोज्यमन्नं स्याद्
भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।
स्पृष्ट्वा मठपतिञ्चैव
सवासा जलमावेशेत् ॥

यह श्लोक "यतिधर्म-सङ्ग्रह" नामक सन्न्यास के अनुशासन रूपक ग्रन्थ में उपलब्ध है। आनन्दआश्रम से प्रकाशित इस पुस्तक के 116 पृष्ठ मेँ यह श्लोक प्राप्त होता है। यह पद्मपुराण से उद्धृत के रूप में उसमें सङ्केतित हुआ है।

सन्दर्भ के अनुसार सन्न्यास में भोजन के अनुशासन को व्यक्त करते हुऐ सन्न्यासी के लिये मठ का अन्न तथा मठपति को अपवित्रत्वेन त्याज्य बताया गया है।

इसका अर्थ निम्नोक्त है। मठ का अन्न सन्न्यासी के लिये अभोज्य है। कदाचित क्षुधापीड़ित सन्न्यासी उपायशून्य हो कर मठ का अन्न खा लेता है तो उसके प्रायश्चित्त स्वरूप एक चान्द्रायण व्रत करना अनिवार्य है। और प्रमादवश भी मठाधीश को स्पर्श कर लेता है या मठाधीश उस सन्न्यासी को आदर सम्मान से भी स्पर्श कर लेता है तो भी वह सन्न्यासी शुद्धिकरण स्वरूप वस्त्र सहित जल में प्रवेश करे।

मठ में देवमन्दिर भी है। वहाँ भोग भी लगता है तो फिर वहाँ का अन्न किसी भी सद्गृहस्थ से याचित अन्न से भी अपवित्र क्यों? और मठाधीश तो लोक में बड़ा सन्न्यासी माना जाता है। सन्न्यास अनुशासन के अनुसार वह कुत्ते या चाण्डाल जैसा अपवित्र कैसे? अब इस पौराणिक सन्न्यास अनुशासन का श्लोकार्थ चिन्तन करेंगे।

लोक में दो बड़े भ्रम हैं। एक- कि मन्दिर का भोग परम पवित्र होता है। दूसरा- मठाधीश उच्च कोटि के सन्न्यासी होते हैं। इस भ्रम का निवारण विना शास्त्रविधि को समझे नहीं हो सकता। मठ मन्दिर के मुख्य गुसाईं होते हैं । वे आरूढ़पतित होते हैं। जैसे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। किन्तु उनसे भी अधिक श्रेष्ठमन्य उनके बडे भाई असुर होते हैं वैसे ही सभी आश्रम में श्रेष्ठ सन्न्यासाश्रम है। सन्न्यासी से श्रेष्ठमन्य गुसाईं ( आरुढ़पतित) होते हैं क्यों कि सन्न्यास से भी उत्कृष्ट कोई आश्रम नहीं होता । आजकाल ये आरुढ़पतित गुसाईं लोग सम्प्रदायाचार्य, महन्त, मण्डलेश्वर, अधिकारी, महामण्डलेश्वर आदि नाम से जाने जाते हैं । इनके पातित्य के तीन हेतु होते हैं। परिग्रह, पङ्क्तिभेद और लोकयाजिता। ये मठ की परिचलना के लिये उचित या अनुचित रूप से जो भी धनादि का परिग्रह करते हैं वह सन्न्यास धर्म का विरोधी है। सन्न्यासिओं से भी उच्च आसान और पृथक अन्नपान से भी पङ्क्तिभेद नामक आसुर्य रूप पाप से पीड़ित होते हैं।

कोई कहे देवराज इन्द्र और देवराज वृहस्पति का उच्चासन और उत्कृष्ट भोग जैसा मठाधीश का विशिष्ट उत्कर्ष क्यों नहीं माना जाय? वस्तुतः देवताओं का स्थान और भोग विभाग असन्न्यास सन्दर्भ है। सन्न्यास में गुरु भी नमस्य मात्र होते हुये अपने सन्न्यासी शिष्यों के समकक्ष होता है। आसान और अशन में पङ्क्तिभेदन उसके लिये भी वैध नहीं होता। परिग्रह तो सन्न्यास की किसी भी भूमि में वैध होता ही नहीं।

मन्दिर के भोगकी बात को सङ्क्षेप में कहें तो वह भोग लगने मात्र से मेध्य नहीं हो जाता। विधिपूर्वक भोग लगता है तो प्रसाद माना जा सकता है।

नमक और मिर्चीयुक्त अन्न बलिवैश्वदेव के लायक भी नहीं होता, देवता प्रसाद के रूप में मेध्य होना तो दूर की बात रही। जगन्नाथ जी के पास जो भोग लगता है, किसी अन्न या व्यञ्जन में नमक या मिर्च नहीं पड़ता। और छोंक भी नहीं लग सकता। आरूढ़पतित लोग कुछ भी खाते हैं कैसे भी बना लेते हैं। और भोग लगता है करके मेध्य बताते हैं। यह धर्मबाह्य विषय है। जैसे समान देवता का वाममार्गीय प्रसाद भी दक्षिणाचारी के लिये अमेध्य है वैसे ही सन्न्यासाश्रमनिष्ठ के लिये मठान्न चाण्डाल के अन्नवत् अमेध्य है।