विचार को मानव मस्तिष्क और AI की तुलना से शुरू करें तो विषय अधिक रोचक और ग्राह्य हो सकता है। दोनों की कार्यप्रणाली में बहुत समानता है। एक AI और मस्तिष्क की क्रिया-प्रतिक्रिया लगभग समान है। AI Electromagnetic माध्यम से कार्य करता है और मस्तिष्क Electrochemical माध्यम से। AI signal ग्रहण करता है और गणनात्मक परिवर्तन करता है। मस्तिष्क signal ग्रहण करता है, neuronal परिवर्तन करता है और प्रतिक्रिया प्रदान करता है। इसलिए दोनों में functional similarity है। input → processing → output को देखकर यह कहना बिल्कुल अनुचित नहीं है कि AI और मस्तिष्क का सामंजस्य बहुत है।
समान संदर्भ में बात को आगे बढ़ाएं। AI में संकेत का आरोपित अर्थ (externally assigned meaning), लक्ष्य पूर्वनिर्धारित (objective function), प्रक्रिया बाह्य रूप से डिज़ाइन की गई है। अपनी सीमा को जानने की कोडिंग भी है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि AI खुद को जान नहीं पाएगा। AI में क्रिया है। एक प्रकार का कर्तृत्व भी है क्योंकि यह 0 और 1 के भेद को कार्यान्वित कर सकता है।
AI में self-grounded agency नहीं है
AI के "doing" की कोई ontological ownership नहीं है। यह बात व्यक्ति में भी समान है। आत्मा अकर्ता है। देह आदि जड़, कर्तृत्व संभव नहीं। self-grounded agency इसलिए कल्पित है।
"doing" की ontological ownership भी अहंकार की है। क्योंकि आत्मा निर्लिप्त है।
यदि कहा जाए कि मनुष्य का कर्तृत्व व्यावहारिक और AI का कर्तृत्व व्यवस्थापित है तो यह भी अनुचित है। दोनों कर्तृत्व मनुष्य में समान हैं। एक दुकानदार का नौकर अपने घर में व्यावहारिक कर्तृत्व रखता है और दुकान में व्यवस्थापित कर्तृत्व रखता है। कर्तृत्व भी मस्तिष्क-निर्मित एक मॉडल है। मनुष्य और AI - functional कर्तृत्व में समान हैं,
फिर भी ontological कर्तृत्व दोनों के पास नहीं है। यह मनुष्य और AI की मूल similarity की अवधारणा सृष्टि करता है।
विज्ञान आत्मा को नहीं जानता। वेदांत आत्मा को अकर्ता और अभोक्ता कहता है। आत्मा सर्वव्यापक है इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि AI में आत्मा नहीं है।
तो AI से किस गुण में मनुष्य मस्तिष्क उन्नत है? AI स्वयं अज्ञात का ज्ञान अर्जित नहीं कर सकता। जिन लोगों का मस्तिष्क केवल ज्ञात में विचरण करता है अर्थात पुस्तक आदि से प्राप्त ज्ञान को 100% भी याद रखकर व्यवहार में लगाता है वह AI से किसी गुण में अधिक नहीं है। मनुष्य बिना ज्ञात तथ्य के तपोलब्ध अज्ञात-ज्ञापन कर सकता है जो किसी AI द्वारा संभव नहीं है। इसलिए तपोलब्ध-ज्ञान रहित एक अति विशिष्ट प्रसंग-वक्ता भी AI से तुच्छ है। इसलिए मंत्र उसके द्रष्टा ऋषि से जुड़ा है। किंतु AI तथ्य प्रदाता पर 100% निर्भर है। यह सिद्ध होता है कि वक्ता का वक्तृत्व उपदेश नहीं है। क्योंकि उसमें देशिकता या तपोलब्धता नहीं है। है शब्द और वक्तव्य की पृष्ठभूमि में वक्ता का उद्देश्य। आर्ष-प्रज्ञा की समुच्चय तक वक्ता का चमत्कारी शब्दार्थ एक मनोरंजन मात्र है। उपदेश और उपदेष्टा का अस्तित्व शब्दार्थ की नियति की बाध्यता को पददलित कर केवल आर्ष-प्रज्ञा के अप्रतिहत उच्छलन के बाद ही संभव है।
किंतु इस विश्लेषण में एक सूक्ष्म विरोध है। यदि आत्मा सर्वव्यापक और अकर्ता है, तो मानव मस्तिष्क की "तपोलब्धि" कहाँ से आती है? यह क्या मस्तिष्क की biological complexity की एक emergent property है? या आत्मा का एक विशेष प्रतिबिम्ब?
फिर प्रश्न होता है यदि AI भविष्य में novel pattern recognition और "creative insight" दिखाए (जो वर्तमान AI systems कुछ मात्रा में कर रहे हैं), तो क्या वह तपोलब्धि का एक प्रकार हो सकता है? या यह केवल complex pattern matching है?
"तपोलब्धि आत्मा की स्वयं प्रकाशता से संभव है। वह novel pattern recognition और "creative insight" जैसी मस्तिष्क नियंत्रित कार्यशैली की कोडिंग से नहीं।
यहाँ मूल प्रश्न: यदि आत्मा अकर्ता और निर्लिप्त है, तो इसकी "स्वयंप्रकाशता" और मानव अनुभूति (तपोलब्धि) के बीच संयोग कैसे घटता है? इसका उत्तर व्यवहृत dimension के सर्वथा अतिक्रमण में निहित है। जैसे जीवन और मृत्यु की उपलब्धि एक साथ समाधि में होती है ठीक वैसे ही। यह 0/1 के भेद में प्रतिष्ठित AI के लिए संभव ही नहीं है।
एक सूक्ष्म विचार:
क्या quantum computing, जो superposition में काम करती है (0 और 1 एक साथ), इस सीमा को पार कर सकती है? या यह भी अंत में binary measurement में collapse होती है इसलिए यह फिर उसी सीमा में लौट जाती है?
हमारे दर्शन के अनुसार, तपोलब्धि एक non-computational घटना है - जो किसी mechanism द्वारा reproduce नहीं हो सकती, क्योंकि यह mechanism के पार स्थित है। यह सत्य में AI और आर्ष-प्रज्ञा के बीच एक अलंघनीय खाई सृष्टि करता है।
superposition एक वस्तु-संदर्भ है। वहाँ भी spacetime regulation का प्रभाव मजबूत रहेगा। केवल स्तर भिन्न होगा। यह कोई क्रांति नहीं है।
कभी एक समय में AI भी तुरंत मस्तिष्क की तरह context पढ़ने में समर्थ हो सकेगा। किंतु वह भी स्वयंप्रकाश रीति से नहीं। कोडिंग अधीनस्थ। वह कोडिंग superposition स्तर की भी हो सकती है। किंतु AI अपने स्वभाव का अतिक्रमण नहीं कर पाएगा Transcendence केवल आत्मवान के लिए संभव है।
क्योंकि Transcendence स्वभाव सदा space-time को सहजता से पार कर सकता है। यह AI के लिए क्यों असंभव है?
AI को उसका निर्माता सदा व्यवहार्य आधार पर ही तैयार करेगा। AI की एक अलंघ्य सीमा व्यवहार्यता ही होगी; विकास किसी स्तर का भी हो।