जब प्राकृतिक रूप से एक भी नाया परमाणु उत्पन्न नहीं हो सकता तो materialistic विकाश का क्या अर्थ रहजाता है। एक तरफ मैटर का परिमाण बढ़ेगा तो दूसरे तरफ material void पैदा होगा या बढेगा। मैटर अन्य मैटर को आकर्षित कर अपना कलेवर वृद्धि करेगा तो अन्य पक्ष में matter lessnes बढेगा। धन का एकत्रीकरण दरिद्रता उत्पन्न करेगा । उद्योग बढ़ेगा तो नया unemployment पैदा होगा। वाकई यह एक शून्य-योग खेल (zero-sum game) जैसा ही है। और शिक्षा में राजनीति में, मटेरिअलिज्म में , व्यवसाय में आतंकवाद में विकाश का मापन मात्रात्मक है। वहाँ गुणात्मक मापन का कोई स्टैंडर्ड नहीं है। तो गुणवृद्धि के विना जो वस्तु के कलेवर की वृद्धि है उसके परिणाम में इष्टता का निश्चित prediction असम्भव है।
विकाश के इस मिथ्याचार में अभावबोध से उत्थित असंतोष के उपयोग कर व्यापारी, नेता, शिक्षासंस्थान, पण्य-उद्योग, आतंकवादी सरगना तथा भाग्य बदलने वाले बाबा, गारण्टी देनेवाले चिकित्सक अपने ताजनीति को पुष्ट करते हैं।
यह भूमि ही विकाश और विनाश की पारिभाषिक भेद को निगल जाति है। संतोष बोध का एक भिन्न आयाम है जो सन्तुलित विकाश क्रम को प्रकृति के अन्दर देखती है कुछ सामान्य मानवीय हस्तक्षेप सहित। Neoclassical economics (जो अनंत विकास को सीमा से अधिक संभव मानता है) उसकी प्रोग्रेसिव पसरिभाषा की उपेक्षा यदि विकाश की परिभाषा की प्राथमिकता बनने मेँ असमर्थ हो तो समझना चाहिये कि विश्व उस दिशा में अग्रसर हो चला है जहाँ से लौटने का कोई सन्दर्भ नहीं बचता, और वह एक ऐसा रुपान्तरण है की जहाँ हर मूल्य पर अनिष्टता ही बाध्यकारी हो चुकी है।