सत्कार्यवाद पर वैज्ञानिक प्रेक्षा

भौतिकी में परमाणु के घटक के पदार्थों के रूप मेँ क्वार्क इत्यादि की गणितीय ढाँचा प्रस्तुत किये गये हैं। और Expanding universe की मिथकीय अतिरंजित व्याख्या भी है। किन्तु एक विशेष टेलीस्कोप की औकात पर सारा भैतिकी-गणित खड़ा है। उससे आगे अज्ञात को अज्ञात न कहने की धृष्टता ने अनेक काल्पनिक नाम और समीकरण बना लिये हैं। कुन्तु असल बात यह है कि भौतिक जगत् में एक भी नया परमाणु बन नहीं सकता। आदि-भौतिकी में परमाणु की संख्या सुनिश्चित है। अज्ञात का कुछ अंश का संवर्द्धित ज्ञान अस्तित्व का Expansion नहीं है। वस्तुतः ज्ञात की सीमा जितनी अधिक होगी वह उतना अधिक अज्ञात का आवरक बनता जायेगा। अपने अज्ञान को छिपाने के लिये भैतिकी ने बताया कि "बिगबैंग" के बाद नूतन परमाणु घटक क्वार्क आदि जितने बने थे उससे अधिक नहीं बन रहे हैं । सिर्फ यह शाब्दिक चालबाजी है। मेँ भौतिक ब्रह्माण्ड की बात ही नहीं करता हूं जो विशेष टेलिस्कोप की ज्ञात परिसर में ही परिच्छिन्न है। में सामग्रीक अस्तित्व की बात करता हूँ। टेलिस्कोपिक मापन से ज्ञात और अनुमेय भौतिक राशि + अशेष अज्ञात और अज्ञेय कार्यकारण श्रृंखला में समाहित अस्तित्वात्मक विश्व जो अनपेक्षित-मापन स्वावस्थ As it is है। यहाँ कार्य वर्ग में एक ही परमाणु का संवर्द्धन सम्भव ही नहीं है। यदि ज्ञात विश्व में भी एक ही अतिरिक्त परमाणु अभिनव रूप से उत्पन्न हुआ तो कार्यकारण नियति से सुरक्षित भौतिकी-गणितीय समीकरण ही पहले ध्वस्त होगा। क्यों कि अनियत कार्यकारण वाद की प्रसस्ति सम्पूर्ण गणितीय ढांचा को 180 डिग्री में पलट देगा। शून्य से परमाणु की उत्पत्ति से हर भविष्यवाणी असंभावित हो जायेगी । विज्ञान का मूल ढांचा ही उजड़ जायेगा। नियत कार्यकारणता तभी सिद्ध होगी जब कार्य के गुण और परिमाण भी नियत हों। यह सत्कार्यवाद दार्शनिक चिन्तन से पहले आर्ष भूमि पर भी देखने को मिलता है। "एतावनस्य महिमऽतो ज्यायाँश्चच पुरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥3॥ स्व महिमा से भी श्रेष्ठ पुरुष की महिमा का एक पाद कार्यकारण रूप है ( मृत्यु= कारण , मृत्युयोग्य या मृत्यु सम्बन्धित=कार्य ) एक ही पाद में नियत रूप से ही कल्पित हैं। त्रिपादी मेँ उनका संक्रमण संभव ही नहीं है। वह अमृत है। न मृत्यु ( कारण ) है । न मृत कारणलीन कोई भी है।
यह सत्कार्य वाद में ही ब्रह्मज्ञान प्रतिष्टित है। किन्तु कल्पित तत्त्व को गणितीय शब्द मात्र से दिद्धान्त बनना केवल यथार्थ का ज्ञानपूर्वक अपमान ही है।

'शून्य से उत्पत्ति' या शून्य में विलय दोनों ही विवाद पतित है। उत्पत्ति और विलय क्रिया हैं। क्रिया नियत कार्यकारणता में ही सम्भव के । अनियत कार्यकारण में आरोपित क्रिया परिमाण विहीन ही होगी।

Big Bang singularity की भी चड्डी क्वांटम मेकैनिकस में उतर चुकी है। तब Big Bang singularity को सत्कार्यवाद का ज्ञापक कहना उसे नंगे अवस्था में बाजार घुमाने जैसा ही है।

Big Bang singularity सत् कारण से कार्य की उत्पत्ति का प्रमाण भी नहीं है; वह प्रचलित भैतिकी-मॉडल की सीमा भी नहीं है। यह अज्ञान को छिपाने की मरहम पट्टी थी। जिसे क्वांटम मैकेनिक्स ने उखाड़ फेंकी है। सत्कार्यवाद की प्रतिष्ठा में इसकी भूमिका बंध्यापुत्र जैसा ही है।